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श्री छत्रपति शिवाजी महाराज
June 4, 2020 • जनस्वामी दर्पण • कहानी ,कविता ,महापुरुषों की जीवनियां

छत्रपति शिवाजीमहाराजके राज्याभिषेकव हिन्दुवी स्वराज्य की स्थापना की वर्षगांठ 'हिन्दुसामाज्य दिवस जयेष्ठमास शुक्ल पक्ष त्रयोदशी के अवसर पर सभी राष्ट्रभक्ती को कोटि कोटि बधाई, शुभकामनाये

आज इस गौरवशाली अवसर पर हिन्दू समाज के शौर्य, पराक्रम व स्वाभिमान के । पुनर्जागरण का संकल्प अवश्य ले.जय शिवाजी, जय भवानी, मित्रो आओ वीर शिवाजी के बारे मे कुछ जानकारिया  ले.अगस्त 1666 मे शिवाजी गायब! उसे धरती लील, गई या आकाश?"औरंगजेब ने अपना माथा पीट लिया. "एक महा भयंकर वैरी अपने पैरो चलकर आया, पिंजरे मे फसा और गायब हो गया।

"नवम्बर 1666 शिवाजी रायगढ पहुंचे। औरंगजेब को पत्र लिखा, उसकी अनुमति के बिना आगरा से चले आने पर खेद व्यक्त किया और मुगल साम्राज्य के प्रति अपनी वफादारी के सबूत के तौर पर अपने बेटे संभाजी को पंचहजारी मनसब देने की प्रार्थना की। शिवाजी के आगरा से निकलते ही ईरान के हमले का खतरा मंडराने लगा। औरंगजेब दिसम्बर तक उस में उलझा रहा। मार्च 1667 मे यूसुफजई ने बगावत कर दी।

मई 1667 मे शहजादा मुअज्जम सूबेदार के रूप मे औरंगाबाद पहुचा। साथ मे महाराजा जसवंत सिंह। मिर्जा राजा जयसिंह को दिल्ली के रास्ते मे उनके अपने बेटे कीरतसिंह ने औरंगजेब की मनसबदारी के लालच मे जहर दे दिया। पत्र का उत्तर न पाकर शिवाजी ने जसवंत सिंह से सम्पर्क साधा। जसवंत सिंह उनके नाम से खौफ खाते थे।

शाहजादा दिल्ली का तख्त हथियाने की मुहिम मे उनकी सहायता को अहम समझ रहा था। दोनो ने उन की जोरदार सिफारिश की। शिवाजी को राजा की उपाधि मिली और संभाजी को मनसबदारी। संभाजीने4 नवम्बर 1667 को शाहजादे से मेट की और अगले दिन राजगट लौट आये। सेनापति प्रतापराव पांच हजार मराठाओ और निराजीपंत के साथ 5 अगस्त 1668 को औरंगाबाद पहंच गए।

उन सब का खर्च मुगल राजकोष के सिर। संभाजी को 15 लाख होण (उस समय प्रचलित मुद्रा) की आय वाली जागीरे मिली। मुगलो के साथ ऐसी व्यवस्था की खबर पाकर बीजापुर ने शिवाजी की ओर से अनाक्रमण संधि की पहल की, जिसकी एवज मे शिवाजी को साटे तीन लाख होण प्राप्त हए। भागानगर का कतुबशाह भी शिवाजी को चौथ भेजने लगा। शिवाजी, शाहजादे और जसवंत के बीच शांति!! जरूर दाल में कुछ काला है। अक्तूबर 1667 मे दिलेर खां औरंगाबाद पहुंचा।

शहजादे ने उसे अपने ऊपर जासूस समझा और दिलेर खां ने उसको उपयुक्त सम्मान नहीं दिया। औरंगजेब शिवाजी या कम से कम संभाजी को पुन: गिरफ्तार करने का स्वप्न देखने लगा। उसने मराठा टुकडी को नि:शस्त्र कर गिरफ्तार करने का आदेश दिया। शहजादे को इसकी भनक लगी तो उसने मराठो को तुरन्त चम्पत कर दिया। औरंगजेब ने शिवाजी को आगरा बुलाते समय एक लाख रुपयों की जो राशि दी थी उसकी वसूली के नाम पर संभाजी की जागीर का कुछ हिस्सा जब्त कर लिया। अप्रैल 1669 मे औरंगजेब ने हिन्दू पूजास्थलों को गिराने का आदेश दिया।

उसने स्वयं अगस्त से सितम्बर 1669 के बीच वाराणसी मे तबाही मचाई और मन्दिरो को तोडा, जिनमे विश्वनाथ मंदिर भी शामिल था। मुसलमानों ने सनातन धर्मसे दवेष के आवेश में इसका ध्वंस किया। इसकी पुनस्स्थापना महाराष्ट्र के पैठण से वाराणसी जाकर बसे रामेश्वर भट्ट के पुत्र नारायण भट्ट द्वारा कराई गई। शिवाजी ने शान्तिकाल (1667-1669) के दौरान सदियों से चली आ रही जागीरदारी को समाप्त किया, पैदल सेना और नौकादल को सुदृढ़ किया।

औरंगजेब की ओर से संधि तोडने को उन्होंने माँ भवानी के आशीर्वाद के रूप में लिया। अब वह औरंगजेब के विरुद्ध संघर्ष छेडने को स्वतन्त्र थे। उन्होंने सबसे पहले उन किलो को वापस लेने का निश्चय किया जिन्हें 1665 की संधि के अन्तर्गत जयसिंह को देना पड़ा था। फरवरी 1670 मे तानाजी मालुसरे ने कोटाणा (सिंहगट) किला उसके रक्षक राजपूत वीर उदयभान के साथ अपनी भी आहति देकर स्वराज्य को समर्पित किया।

फरवरी 1670 मे सोयरा बाई ने एक पुत्र को जन्म दिया। जीजाबाई ने शिवाजी से कहा, "यह बच्चा उलटा पैदा हुआ है। शिवाजी ने मुस्कुराते हुए कहा, "यह बालक अवश्य ही दिल्ली की बादशाहत का तख्ता उलट देगा और अपने औंधे राज्य को सीधा करेगा।"8 मार्च 1670 को नीलोपंत ने किलेदार रजी-उद्-दीन खाँ को बन्दी बना कर पुरन्दर किले पर भगवा फहराया। उसी वर्ष जून के अंत तक शिवाजी ने कल्याण (मार्च), लोहगढ़ (मई).माहली, कर्णाला और रोहिडा (जून) किलो को भी जीत लिया।

शिवाजी को लगा कि अब देर-सबेर उन्हें मुगल शक्ति से टकराना होगा। उन्होने अपनी नई राजधानी के लिए प्राकृतिक रूप से अधिक सुरक्षित रायगढ किले का चयन किया, जिसे उन्होंने सन् 1656 मे मोरे चन्द्रकान्त के निधन के उपरान्त प्राप्त किया  था। नए किले के निर्माण के लिए शिवाजी ने अक्तूबर मे सूरत के अतिधनाट्य व्यापारियों से स्वराज्य के लिए उनका योगदान ग्रहण किया और वहा से लौटते समय वानी टिंटोरी की लडाई मे नामी मुगल सिपहसालारो इखलास खां और दाऊद खाँ को परास्त किया।

अक्तूबर मे उनके पेशवा मोरोपंत पिंगले ने नासिक के निकट त्र्यम्बक का किला जीत लिया। औंध, पट्टा, रावला और जावला भी शीघ ही स्वराज्य के अंग बन गए। बरार और खानदेश में उत्पात मचाने के बाद, जनवरी 1672 में उन्होने साल्हेर का किला जीत लिया, जिससे उनका दबदबा बहुत बट गया। राम दास पांगेरा ने दिलेर खां के कानेरा किले को लेने के प्रयास को निष्फल कर दिया। शिवाजी और मुगलों के और भी छोटे-बड़े युद्ध चलते रहे। सन् 1672 मे अप्रैल मे गोलकुण्डा के अब्दुल्ला कुतुबशाह का और नवम्बर मे बीजापुर के 35 वर्षीय अली आदिलशाह का निधन हो गया।

स्थिति का लाभ उठाते हए शिवाजी ने बीजापुर के कई इलाको पर अधिकार कर लिया जिनमे पन्हाला का किला सबसे महत्वपूर्ण था। अब शिवाजी कर्मणा दक्षिण भारत के एकछत्र सम्राट बन चुके थे। औरंगजेब को अप्रैल 1674 मे पठानो के विद्रोह का दमन करने के लिए पंजाब के हसन अब्दाल की ओर कूच करना पड़ा जहा वह जून मे पहुंचा। गागाभट्ट रायगट पधारे। "मुसलमान बादशाह राजसिंहासन पर बैठते है तो उनके सिर पर छत्र होता है। शिवाजी ने चार बादशाहतों पर विजय पाई है और उनके पास 75,000 घोड़े, सेना और किले आदि है।

यवन हिन्दुओ के पूजा-स्थलों को नष्ट-भ्रष्ट कर रहे है। अब भयग्रस्त हिन्दुओ को यह । आश्वासन मिलना चाहिए कि उनका रक्षक एक छत्रपति राजा विदयमान है। "गागाभट्ट के इसतर्कसे सबको बड़ी प्रसन्नता हुई।प्रसारक्षक राज्याभिषेक की तैयारिया प्रारम्भ हो गई।  ब्राह्मणों ने कहा,शिवाजी क्षत्रिय नहीं है। गागाभट्ट ने शिवाजी की वंशावलीखोजी और उन्हें उत्तर भारत के सिसोदिया वंश का क्षत्रिय सिद्ध किया तथा "शिवराज्याभिषेक प्रयोग नामक ग्रन्थ की रचना की।

राज्याभिषेक से पर्व शिवाजीने विभिन्न क्षेत्रो में। जाकर देवताओं के दर्शन किये। मई के अन्तिम सप्ताह से एक सप्ताह तक चले कार्यक्रम में प्रथम शिवाजी का उपनयन संस्कार. तुला दान व तुला पुरुषदान संपन्न हए, उनका अपनी रानियों से एक बार पुन: विवाह हुआ, जून के प्रथम सप्ताह को गृहयज्ञ, नक्षत्र होम हुआ। उत्तरपूजन के बाद आचार्यो को प्रतिमाए प्रदान की गइ। द्वादसी तिथी को रात्रि के समय निऋर्तियाग हुआ। सिंहासनारोहण का मुहूर्त ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी आनन्द संवत्सर दिन शनिवार को प्रात:काल के प्रथम प्रहर मे था।

धार्मिक विधि शुक्रवार की सायंकाल से प्रारम्भ हो गई। अभिषेक विधि के लिए युवराज संभाजी, रानी सोयराबाई और शिवाजी महाराज अभिषेकशाला मे पधारे। भांति-भांति के कंभों में जल लेकर महाराज का मंत्रघोष के साथ अभिषेक किया गया। इस अभिषेक मे सभी जाति एवं वर्ण के लोगों ने भाग लिया। मध्य रात्रि बीत जाने के बाद अभिषेक समाप्त हआ। युवराज संभाजी, रानी सोयराबाई और शिवाजी महाराज राजसभागृह मे आए। मंद गति से पग बढ़ाते हए शिवाजी महाराज सिंहासन के चबूतरे पर चढ़े।

गागा भट्ट ने उन्हे स्वर्ण राजदण्ड दिया। महाराज ने उसे माथे से लगाया और अतीव विनमतापूर्वक सिंहासन पर आसीन हुए। गागा भट्ट ने मंत्रोच्चारण करते हए बहमूल्य रत्नों से जडित. मोती के झालरों वाला छत्र सिंहासन पर लगाया और अगले ही क्षण, पूर्व दिशा में सूर्य उदित होने के साथ-साथ घोषणा सुनाई दी- "क्षत्रिय कुलवंत सिंहासनाधीश्वर गोब्राह्मण प्रतिपालक हिंद पद पादशाह श्रीमंत श्री छत्रपति शिवाजी महाराज की..जयss।