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सबरीमाला मंदिर में प्रवेश को लेकर न्यायालय ने कहा कि यह भावनात्मक मुद्दा है और हम नहीं चाहते कि स्थिति विस्फोटक हो
December 13, 2019 • जनस्वामी दर्पण • प्रदेश न्यूज

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सबरीमाला मंदिर में प्रवेश को लेकर न्यायालय ने कहा यह भावनात्मक मुद्दा है और हम नहीं चाहते कि स्थिति विस्फोटक हो

उच्चतम न्यायालय ने दो महिला कार्यकर्ताओं को सबरीमला मंदिर में प्रवेश करने के लिए केरल सरकार को सुरक्षा मुहैया कराने का निर्देश देने से इनकार कर दिया। सुरक्षा मुहैया कराने के लिए बिंदू और फातिमा नाम की महिलाओं ने याचिका लगाई थी। न्यायालय ने कहा, यह “भावनात्मक” मुद्दा है और हम नहीं चाहते कि चाहते कि स्थिति “विस्फोटक” हो। हम किसी तरह की हिंसा नहीं चाहते। हालांकि प्रधान न्यायाधीश एस ए बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह भी कहा, कि “हर महिला जो वहां जाना चाहती है, उसे जाने का अधिकार मिलना चाहिए।” पीठ ने कहा कि मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश को अनुमति देने वाले 28 सितंबर 2018 के आदेश पर कोई रोक नहीं लगाई गई है लेकिन “यह भी सच है कि यह अंतिम फैसला नहीं है।” इस पीठ में न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति सूर्यकांत भी शामिल थे। 

अब बड़ी पीठ करेगी सुनवाई

सितंबर 2018 में, शीर्ष अदालत ने एक फैसले में सभी आयु वर्ग की महिलाओं को सबरीमला मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति दी थी। नवंबर 2019 में, तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की पीठ ने मामले की जांच को सात जजों की पीठ को भेजने की बात कहते हुए उसमें अन्य धर्मों के धार्मिक स्थानों में महिलाओं के प्रवेश मुद्दे को भी शामिल किया था।

जस्टिस बोबडे ने कहा, “मुद्दा यहां निर्णय का है। इस पर गौर करने के लिए बड़ी बेंच के लिए कोई संदेह नहीं है। आज जो स्थिति है वह वहां हजारों सालों से है। इसलिए इस पर आज कोई आदेश नहीं।”

यह भावनात्मक मुद्दा

बिंदू की पैरवी करने वालीं वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने 2018 के फैसले पर अदालत को कहा, “हम सभी हिंसा से बचने के लिए यहां हैं, इस देश की नींव अहिंसा पर रखी गई है। हम हिंसा को प्रोत्साहित नहीं करते हैं। मेरी मुवक्किल एक दलित और हिंदू महिला है। वह आस्तिक है इसलिए मंदिर में प्रवेश किया था। चीफ जस्टिस का इस पर जवाब था, “यह अंतिम फैसला नहीं है।”  

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि फैसला याचिकाकर्ता के पक्ष में है। यह ऐसी स्थिति नहीं है जहां किसी के निजी अधिकार शामिल हैं और किसी के भी जीवन का अधिकार भी नहीं छीना गया है। चीफ जस्टिस ने कहा, “यह बहुत ही भावनात्मक मुद्दा है, इस मामले को बड़ी बेंच को जाने दें।”

रजामंदी रहे तो अच्छा

मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “हम इस मामले के प्रभाव पर विचार करने के बाद बता रहे हैं। हम कोई आदेश नहीं दे रहे हैं। अगर वे (मंदिर अधिकारी) खुशी से मंदिर में आपका स्वागत करते हैं, तो हमें कोई कठिनाई नहीं है।” प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि वह जल्द से जल्द बड़ी पीठ का गठन करने का प्रयास करेंगे और उसके समक्ष समीक्षा याचिका को भी सूचीबद्ध करेंगे।