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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रामप्रकाश धीर जी 16 नवंबर /जन्म दिवस
November 16, 2019 • जनस्वामी दर्पण • आरएसएस न्यूज
16 नवम्बर / जन्म दिवस – ब्रह्मदेश में संघ के प्रचारक रामप्रकाश धीर जी
 
नई दिल्ली. ब्रह्मदेश (बर्मा या म्यांमार) भारत का ही प्राचीन भाग है. अंग्रेजों ने जब 1905 में बंग-भंग किया, तो षड्यंत्रपूर्वक इसे भी भारत से अलग कर दिया था. इसी ब्रह्मदेश के मोनीवा नगर में 16 नवम्बर, 1926 को रामप्रकाश धीर जी का जन्म हुआ था. बर्मी भाषा में उनका नाम 'सयाजी यू सेन टिन' कहा जाएगा. उनके पिता नंदलाल जी वहां के प्रसिद्ध व्यापारी एवं ठेकेदार थे. सन् 1942 में द्वितीय विश्व युद्ध के समय जब अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां तेजी से बदलीं, तो पूरा परिवार बर्मा छोड़कर भारत में जालंधर आ गया. उस समय रामप्रकाश जी मोनीवा के वैस्ले मिशनरी स्कूल में कक्षा नौ के छात्र थे.

इसके बाद उनकी शेष पढ़ाई भारत में ही हुई. इस दौरान उनका सम्पर्क राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से हुआ. धीरे-धीरे संघ के विचार ने उनके मन में जड़ जमा ली. सन् 1947 में उन्होंने पंजाब विवि से बीए किया. बीए में उनका एक वैकल्पिक विषय बर्मी भाषा भी था. शिक्षा पूर्ण कर वे संघ के प्रचारक बन गये. उनका प्रारम्भिक जीवन बर्मा में बीता था. अतः उन्हें वहां पर ही संघ की स्थापना करने के लिए भेजा गया, पर 1947-48 में वहां काफी आंतरिक उथल-पुथल हो रही थी. अतः कुछ समय बाद ही उन्हें वापस बुला लिया गया.

इसके बाद वे पंजाब में ही प्रचारक रहे, पर संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता डॉ. मंगलसेन जी के आग्रह पर सन् 1956 में उन्हें फिर बर्मा भेजा गया. भारत से बाहर स्वयंसेवकों ने कई नामों से संघ जैसे संगठन बनाये हैं. इसी कड़ी में डॉ. मंगलसेन ने सन् 1950 में बर्मा में 'भारतीय स्वयंसेवक संघ' की स्थापना की थी, जो अब 'सनातन धर्म स्वयंसेवक संघ' कहलाता है. इसका विस्तार बहुत कठिन था. न साधन थे और न कार्यकर्ता. फिर बर्मा का अधिकांश भाग पहाड़ी है. वहां यातायात के साधन बहुत कम हैं. ऐसे में सैकड़ों मील पैदल चलकर रामप्रकाश जी ने बर्मा के प्रमुख नगरों में संघ की शाखाएं स्थापित कीं.

बर्मा मूलतः बौद्ध देश है, जो विशाल हिन्दू धर्म का ही एक भाग है. रामप्रकाश जी ने शाखा के माध्यम से युवाओं को जोड़ा, तो पुरानी पीढ़ी को प्रभावित करने के लिए महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं पर एक प्रदर्शिनी बनायी. इसे देखकर बर्मी शासन और प्रशासन के लोग भी बहुत प्रसन्न हुए. उन्होंने इसे बर्मा के सब नगरों में लगाने का आग्रह किया और इसके लिए सहयोग भी दिया. इस प्रकार प्रदर्शिनी के माध्यम से जहां एक ओर हिन्दू और बौद्ध धर्म के बीच समन्वय की स्थापना हुई, वहां रामप्रकाश जी का व्यापक प्रवास भी होने लगा. आगे चलकर यह प्रदर्शिनी थाइलैंड में भी लगायी गयी.

यह प्रदर्शिनी बर्मा में संघ के विस्तार में मील का पत्थर सिद्ध हुई. इसे देखने बड़ी संख्या में आम जनता के साथ-साथ बौद्ध भिक्षु और विद्वान भी आते थे. इसका पहला प्रदर्शन यंगून के पहाड़ों में स्थित ऐतिहासिक 'काबा अये पगोडा' में रेत की प्रतिमाओं और बिजली की आकर्षक चमक-दमक के बीच हुआ. आजकल तो तकनीक बहुत विकसित हो गयी है; पर उस समय यह बिल्कुल नयी बात थी. अतः पहले प्रदर्शन से ही इसकी धूम मच गयी.

इसके बाद रामप्रकाश जी का जीवन बर्मा और थाइलैंड में संघ शाखा तथा उसके विविध आयामों के विकास और विस्तार को समर्पित रहा. वृद्धावस्था में वे यंगून के पास सिरियम स्थित 'मंगल आश्रम छात्रावास' में रहकर बर्मा में संघ कार्य के विकास और विस्तार का इतिहास लिखने लगे. 20 जून, 2014 को यंगून के एक चिकित्सालय में फेफड़े और हृदय में संक्रमण के कारण उनका निधन हुआ. उनका अंतिम संस्कार उनकी कर्मभूमि में ही किया गया. रामप्रकाश जी का पूरा परिवार संघ से जुड़ा था. उनके बड़े भाई रामप्रसाद धीर सेवानिवृत्त होने के बाद विश्व हिन्दू परिषद में सक्रिय थे. 17 मार्च, 2014 को विहिप के दिल्ली स्थित केन्द्रीय कार्यालय पर ही उनका निधन हुआ था.