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परमपूज्य बालासाहब देवरस
June 17, 2020 • जनस्वामी दर्पण • कहानी ,कविता ,महापुरुषों की जीवनियां

परमपूज्य बालासाहब देवरस

परमपूज्य बालासाहब देवरस का जन्म 11 दिसम्बर 1915, मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी वि. संवत 1972 को नागपुर के इतवारी क्षेत्र के देवरस बाड़े में हुआ।

देवरस परिवार मूलत: बालाघाट म.प्र. का रहने वाला था। बालाघाट जिले के कारंजा नामक स्थान में उनकी कृषि थी। यह लांजी तहसील में है। बालासाहब पाँच भाई थे। इनका स्थान भाईयों में चौथे क्रम पर था। उनकी तीन बहनें थीं।

1927 के बालासाहब प.पू. डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार के सम्पर्क में आए। यहीं से उनका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में प्रवेश हुआ। 1925 में संघ प्रारंभ हुआ था। अतः यह कहना उचित होगा कि बालासाहब प्रारंभ से ही संघ के स्वयसेवक थे।

1931 में बालासाहब ने न्यू इंगलिश हाईस्कूल नागपुर से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। 1932 में डॉ. हेडगेवार ने उन्हें इतवारी शाखा प्रारंभ करने का दायित्व सौंपा। 1935 में उन्होंने मारेस महाविद्यालय नागपुर से संस्कृत एवं दर्शन शास्त्र में स्नातक परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। 1937 में एल.एल.बी. मैरिट में उत्तीर्ण की। उसीवर्ष उन्हें नगर कार्यवाह की जिम्मेदारी सौंपी गई। अपने निजी खर्च की व्यवस्था देत अनाथ विद्याथी गृह नागपुर में शिक्षक की नौकरी शुरू की। इस बीच पुणे के संग प्रशिक्षण वर्ग में मुख्य शिक्षक के दायित्व का भी संपादन किया। 1939 में वह कोलकाता में प्रचारक बनकर गए

1010 में प.पडॉ. हेडगेवार जी का निधन हो गया। उनके बाद परम पूजनीय गुरुजी को सरसंघचालक का दायित्व सौंपा गया। 1946-47 में बाला साहब को सह-सरकार्यवाह का अखिल भारतीय दायित्व सौंपा गया। 1948 में महात्मा गाँधी जी की हत्या का मिथ्या आरोप लगाकर संघ पर प्रथम प्रतिबंध लगाया गया। इस सिलसिले में बालासाहब जी चार मास तक कारागार में रहे। प्रतिबंध उठवाने के लिए राजकीय नेताओं से भेंट वार्तालाप करने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही।

1919 में प.प. गुरुजी ने उन्हें नागपुर से तरुण भारत के संपादन तथा प्रकाशन की विशेष जिम्मेदारी सौंपी।

1965 में माननीय भैयाजी दाणी के देहावसान के बाद इनको सरकार्यवाह का दायित्व सौंपा गया जिसका 1973 तक उन्होंने सफलता पूर्वक निर्वहन किया। 1973 में प.पू. गुरुजी के स्वर्गवास के उपरान्त बालासाहब ने संघ के सरसंघचालक पद का दायित्व संभाला। संगठन की दृष्टि से यह सर्वोत्तम दायित्व था। परम पूज्य गुरुजी पूर्व में यह उद्घोषणा मा. दादा गोरवाडकर जी के सम्मुख कर गए थे कि बाला साहब अपने संघ के भावी सरसंघचालक हैं।

21वर्ष तक बालासाहब ने सरसंघचालक के दायित्व का अत्यंत कुशलतापूर्वक निर्वाह किया। इस अवधि में अनेक आनुषांगिक कार्यों के रूप में संघ कार्य का विस्तार हुआ।

1975 में संघ पर आपातकाल के कारण दोबारा प्रतिबंध लगा। 1977 में यह प्रतिबंध उठा। 1992 में संघ पर तीसरा प्रतिबंध लगा जो एक साल बाद उठा। मार्च 1994 को बालासाहब ने अपने गिरते हुए स्वास्थ्य के कारण सरसंघचालक पद से निवृत्ति की घोषणा की।

17जून 1996 रात्रि 8 बजकर 10 मिनट पर, पुणे के रूबी हाल क्लीनिक नाम के प्रसिद्ध चिकित्सालय में इनकी इहलीला समाप्त हो गई। 18 जून 1996 को सायंकाल को नागपुर के गंगाघाट पर उनका अन्तिम संस्कार किया गया।

प.पू.बालासाहब एक मौन कर्मसाधक थे। किसी भी समस्या पर शीघ्र एवं अचक निर्णय की उनकी क्षमता असाधारण थी। व्यवस्थापन में कशलता. अनभव ता गहन चिंतन उनके व्यक्तित्व के अन्य महत्वपूर्ण गुण थे। उनका ध्यान सैद्धान्तिक की बजाय व्यवहार्य बातों पर अधिक रहता था।

भारतीय जन समाज ने समाज के इस मौन साधक को उनकी सेवाओं के परिप्रेक्ष्य में अनेक बार सम्मानित किया। 01 अगस्त 1991 को उन्हें लोकमान्य तिलक सम्मान से, अक्तूबर 2 को नागपुर के विश्व हिन्दू परिषद् के संत सम्मेलन में 'यति सम्राट की उपाधि से', 1994 में ही जीजामाता प्रतिष्ठान की ओर से जीजामाता पुरस्कार से तथा 1996 में स्वातंत्र्यवीर सावरकर पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

बालासाहब सामाजिक समरसता के प्रबल पक्षधर थे। उनका प्रसिद्ध वाक्य था-"यदि छुआछूत पाप नहीं तो फिर कुछ भी पाप नहीं है"। सामाजिक समरसता के लिए प्रत्येक विद्यालय उपेक्षित बस्तियों में एक संस्कार केन्द्र चलाए, यह उनकी बड़ी आकांक्षा थी। उनके व्यक्तित्व में आदर्शवादिता एवं व्यवहारिकता का बहुत ही संतुलित समन्वय एवं मेल था। उनका पूरा जीवन भारतीय संस्कृति एवं हिन्दुत्व की रक्षा के लिए समर्पित रहा। संघ को बालासाहब की सबसे बड़ी देन यह थी कि उन्होंने संघ के तत्वज्ञान को, समाज कार्य के लिए व्यवहार रूप में रूपान्तरित किया। वे हमेशा स्वयंसेवकों को संघ के तत्वज्ञान को अपने आचरण में उतारने के लिए प्रेरित करते रहते थे।

संगीत, साहित्य एवं अध्यात्म से उनका गहरा लगाव था। उन्हें श्रीमद्भगवद्गीता एवं महाकवि कालिदास का मेघदूत पूरी तरह कंठस्थ था। वीर सावरकर जी की कविताएं भी उन्हें बहुत प्रिय थी। विशेषकर उनकी लिखी स्वातंत्रदेवता की आरती 'ज्योस्तुते श्री महन्मंगले' को वे अक्सर सुनना पसन्द करते थे। उनके देहान्त पर रांची एक्सप्रेस, रांची बिहार ने अपने संपादकीय में लिखा था - राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख के रूप में, बालासाहब ने अपने लगभग दो दशकों के कार्यकाल के दौरान न केवल लाखों लोगों को समाज सेवा के लिए प्रेरित किया बल्कि भारतीयता के गंध में, रचे-बसे नए भारत के निर्माण की राह भी दिखलाई। वे मानते थे कि सेवा भाव से ही समाज की विभिन्न इकाइयों का दिल जीता जा सकता है और उन्हें आपस में जोड़कर, अन्ततः राष्ट्रचेतना का विकास किया जा सकता है।

प.पू. बालासाहब देवरस सांस्कृतिक एकता के प्रबल समर्थक थे और इस अर्थ में वे एक सामाजिक अभियन्ता के रूप में, नए भारत के नव निर्माण के लिए एक-एक ईंट जोड़ते रहे। संघ का बीजारोपण यदि डॉक्टर हेडगेवार ने किया तो प. पू. गुरुजी ने उसे पुष्पित और पल्लवित किया और उसे अपार विस्तार माननीय बालासाहब देवरस ने दिया। आधुनिक भारतीय इतिहास उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व के उल्लेख के बिना अपूर्ण है।