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महात्मा बुद्ध
May 7, 2020 • जनस्वामी दर्पण • कहानी ,कविता ,महापुरुषों की जीवनियां

महात्मा बुद्ध

आज से लगभग ढाई हजार साल पहले जब भारत कर्मकाण्ड के जंजाल में उलझ गया था। हिंसा मिथ्याचार, कुरीतियों और कुप्रथाओं के कारण समाज जीवन क्षीण हो गया था। सामाजिक मूल्यों का ह्रास हो गया था। दैवी शक्ति कमजोर और आसुरी शक्तियों का बोलबाला बढ़ रहा था।

ऐसे समय में ईसा से ६२३ वर्ष पूर्व लिच्छवि वंश के राजा शुद्धोदन और महामाया ने कपिल वस्तु के लुम्बिनी में माघ पूर्णिमा के पावन समय में एक श्रेष्ठ बालक को जन्म दिया। बालक का नाम 'सिद्धार्थ' रखा। बालक बचपन से ही अत्यंत सरल, दयालु तथा वैरागी प्रवृत्ति का था।

संसार चलाने के लिए योग्य और आवश्यक शिक्षा माता-पिता ने सिद्धार्थ को उचित ज्ञानी गुरुओं के नेतृत्व में करायी। बीस वर्ष की आयु में इनका विवाह यशोधरा से हुआ जिनसे राहुल नामक बालक पैदा हुआ। राजभवन में पलने के कारण दुःख कैसा होता है यह राजकुमार सिद्धार्थ ने अपनी आँखों से कभी देखा न था।

एक बार नगर भ्रमण करते समय एक वृद्ध, एक रोगी और एक मृतक को देखा। तब पूछा कि मुझे भी बूढ़ा होना पड़ेगा? - हाँ अवश्य। क्या मुझे भी बीमारी होगी ? हॉ और फिर अंतिम प्रश्न कियाक्या मैं भी मरूँगा? हैं। मंत्री ने कहा। जीवन का अंतिम सत्य क्या है ? ऐसा विचारों का तूफान मन-बुद्धि में खड़ा हो गया। जब मरना ही है तो अंतिम सत्य क्या है ? यह हमें खोजना चाहिए।

कहते हैं संसार से तीव्र वैराग्य स्थिर हो गया तो वह अट्ठाईस वर्ष की आयु में पत्नी-बच्चे और राज्य व उसके सुखों को छोड़ शाश्वत सत्य की खोज में निकल पड़े। छह वर्षों तक जंगलों में जाकर तप करते रहे। अंत में गया (बिहार) में एक 'अश्वत्थ' (पीपल) के पेड़ के नीचे ध्यानस्थ होकर बैठ गये। उनन्चास (४६) दिनों के बाद बोधत्व यानी ज्ञान की प्राप्ति हुई। तब से गौतम बुद्ध कहलाने लगे। बोध गया से बुद्धत्व की प्राप्ति के बाद काशी के पास सारनाथ में अपने पाँच साथियों को धर्मोपदेश देकर 'धर्मचक्र का प्रवर्तन किया।

गौतम बुद्ध ने तप और भोगों को छोड़कर मध्यम मार्ग को सबसे उत्तम बतलाया। जाति-पाँ ति, ऊँच-नीच की भावना को हतोत्साहित कर समाज को हिंसा त्याग समरसता का उपदेश दियाउन्होंने पापनाश, पुण्य संचय तथा चित्त शुद्धि पर विशेष बल दियामहात्मा बुद्ध वाणी से ज्यादा स्वयं के आचरण से भक्तों को उपदेश देते थे।

ज्ञान की अपेक्षा कर्म को प्रधानता दीमनुष्य क्या सोचता है ? क्या जानता है ? यह महत्त्व का नहीं बल्कि यह कि वह क्या करता है? "कर्म प्रधान विश्व-करि राखा।" गौतम बुद्ध की तपस्थली राजगिरि और गया रही जो मगध (बिहार) में है। इसलिये बौद्ध धर्म को प्रथम राजाश्रय वहीं मिला। उस समय बिम्बसार वहाँ का राजा था। गौतम बुद्ध के शिष्य बन धर्म का प्रचार कियाउनके दो सौ वर्षों बाद सम्राट अशोक ने बौद्ध मत स्वीकार कर उसके प्रचार-प्रसार में सहायता की।

विश्व में बौद्ध धर्म को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्रदान करने में सम्राट अशोक का योगदान सर्वाधिक है। महात्मा बुद्ध के कार्यों की महत्ता के कारण भगवान के दशावतारों में उन्हें नौवाँ अवतार माना। उनके उपदेशों को "त्रिपिटक' में संगृहीत किया गया है। जो वास्तव में भी तीन ग्रंथ हैं। १. सूत्रपिटक, २. विनय पिटक, ३. अभिधम्म पिटकइनके विचारों से प्रभावित होकर हजारों लोग शिष्य बन गयेबड़े कहे जाने वाले राजा-महाराजा भी शिष्य बने।

धीरे-धीरे बौद्धमत का प्रचार भिक्षुओं के द्वारा चीन, जापान, श्रीलंका, इण्डोनेशिया सहित विश्व और अनेक देशों में भी हुआ। सैंकड़ों लोगों ने अपनी सुख-सुविधा को छोड़ा और भिक्षु बन गये। महिलाओं को भी किसी प्रकार की रोक नहीं थी। वह भी भिक्षुणियाँ बनीं और मत के प्रचार में निकलींरामधारी सिंह दिनकर के विचार में बुद्ध हिन्दुत्व की परम्परा के शोधक थे, संहारक नहीं। मैथ्यु आर्नल्ड ने उन्हें 'एशिया की ज्योति' कहा। लेखिका मिस हार्नर लिखती हैं कि प्राचीन काल में बुद्ध ही ऐसे थे जिन्होंने बुद्धिवाद पर मनुष्य की आस्था जमाने का प्रयत्न किया। भारत को ही नहीं वरन विश्व को करुणा, प्रेम, अहिंसा का संदेश देने वाले महात्मा बुद्ध अपनी अस्सी वर्ष की आयु में शरीर छोड़ चले गये।