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मध्य प्रदेश इंदौर के गांव गौतमपुरा में दीपावली के दूसरे दिन हिंगोट युद्ध की परंपरा
October 27, 2019 • संवाददाता आर रावल
  • मध्य प्रदेश के इंदौर जिला के गांव गौतमपुरा में  हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी दीपावली के दूसरे दिन हिंगोट युद्ध की परंपरा है यह परंपरा बहुत पुरानी  है हिंगोट युद्ध को देखने के लिए दूर दूर से लोग आते हैं 

हिंगोट युद्ध: दिवाली के अगले दिन

 इंदौर के गौतमपुरा में  अक्टूबर को हिंगोट युद्ध होगा। सैकड़ों दर्शकों के सामने तुर्री और कलगी हाथों में ठाल लिए हिंगोट हथियार से लैस युद्ध के लिए तैयार रहेंगे।

 
इंदौर। इंदौर के गौतमपुरा में   हिंगोट युद्ध होगा। सैकड़ों दर्शकों के सामने तुर्री और कलगी हाथों में ठाल लिए हिंगोट हथियार से लैस युद्ध के लिए तैयार रहेंगे। फिजा में बिखरे त्योहारों के रंग-उल्लास के बीच छिड़ने वाले इस परंपरांगत युद्ध में कलगी और तुर्रा आपस में एक दूसरे को धूल चटाने की कोशिश करेंगे।
 
हर साल की तरह इस साल भी दीपावली के अगले दिन यहां से करीब 55 किलोमीटर दूर गौतमपुरा कस्बा हिंगोट के युद्ध का मैदान बनेगा। इस जंग में इस्तेमाल के हिंगोट नामक फल का उपयोग किया जाता है। हिंगोट को सुखाकर इसके अंदर का गूदा निकाला जाता है। फिर खोखले खोल में बारुद को इस तरह भरा जाता है। उसके बाद इसमें लकड़ी की पतली खिपची फंसा इसे अग्निबाण का रूप दिया जाता है।
 
 
हिंगोट के पारंपरिक आयोजन के लिए गौतमपुरा में व्यापक व्यवस्था की जाता है। लोग उड़ते हुए अग्निबाणों से महफूज रह सके इसके व्यापक उपाय किए जाते हैं। फिर भी हर बार कोई ना कोई दुर्घटना हो ही जाती है। अब तो प्रशासन वहां डॉक्टर और फायर ब्रिगेड की टीम दोनों की ही व्यवस्था करता है।
 
गौतमपुरा के  योद्धाओ के दल को तुर्रा नाम दिया जाता है। जबकि रुणजी गांव के लड़ाके कलगी दल की अगुवाई करते हैं। हिंगोट युद्ध की परंपरा की शुरूआत कब और कैसे हुई, इस सिलसिले में इतिहास के प्रमाणिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं है । लेकिन कुछ दंत कथाएं जरुर प्रचलित हैं कि रियासत काल में गौतमपुरा क्षेत्र की सरहदों की निगहबानी करने वाले लड़ाके मुगल  सेना के उन दुश्मन घुड़सवारों पर हिंगोट दागते थे, जो उनके इलाके में हमला करते थे।
 
वहीं एक कथा के अनुसार कलगी और तुर्रा गांव के लोगों में दुश्मनी थी। वे अकसर झगड़ा करते थे। हिंगोट युद्ध उनके उसी गुस्से को खत्म करने और आपसी प्रेम को बढ़ाने के लिए शुरू किया गया।
 
घायल होना- हिंगोट युद्ध बेहद खतरनाक होता है। इसमें कई लोग घायल होते हैं। हिंगोट छूटने के बाद वह कहां जाएगा यह कोई नहीं कह सकता। बीच में प्रशासन ने इस पर प्रतिबंध लगाने का भी सोचा था लेकिन ग्रामीण लोगों के दबाव में यह फैसला लागू नहीं हो पाया।