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कविता जाने क्यों
December 6, 2019 • जनस्वामी दर्पण .सरस्वती रावल • कहानी ,कविता ,महापुरुषों की जीवनियां

जाने क्यों

जाने क्यों अब शर्म से चेहरा गुलाबी नहीं होते ।

जाने क्यों अब मस्त - मिजाज नहीं होते ।

पहले  बता  दिया  करते थे दिल की  बातें ।

जाने क्यों अब चेहरे खुली किताब नहीं होते ।

सुना है बिन कहे दिल की बात समझ लेते थे ।

गले लगते ही दोस्त हालात समझ लेते थे ।

तब न फेसबुक न स्मार्ट मोबाइल होता था ।

तब ना इंस्टाग्राम ना ट्विटर अकाउंट था ।

.एक चिट्ठी से ही दिलों के जज्बात समझ लेते थे ।

.सोचता   हूँ  हम कहाँ  से कहाँ  आ गए ।

.प्रैक्टिकली सोचते सोचते भावनाओं को खा गए ।

.अब भाई भाई से समस्या का समाधान कहाँ पूछता है। 

.अब बेटा बाप से उलझनों का निदान कहाँ पूछता है। 

.अब कौन गुरु के चरणों में बैठकर ज्ञान की परिभाषा सीखें ।

 परियों  वाली बातें अब किसे आती है ।

.अपनों की याद अब किसे रुलाती है ।

.अब कौन गरीब को सखा बताता है ।

 .अब कहाँ कृष्ण सुदामा को गले लगाता है ।

.जिंदगी में हम प्रेक्टिकल हो गए मशीन बन गए हैं सब 

.इंसान जाने कहाँ खो गए 

.( सरस्वती रावल )