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गुरु गोविन्द सिंह
January 2, 2020 • जनस्वामी दर्पण • कहानी ,कविता ,महापुरुषों की जीवनियां

गुरु गोविन्द सिंह                            गुरु गोविन्दसिंह का जन्म सिक्ख पंथ की स्थापना करने वाले गुरु नानकदेव की नौवीं पीढ़ी तेगबहादुर के यहाँ माता गुजरी से २२ दिसम्बर सन १६६६ पीष सुदी सप्तमी को पटना साहेब विहार में हुआ। नाम गोविन्दगय रखा गयाफरवरी १६७१ में गोविन्दराय परिजनों के साथ आनन्दपुर आ गये । यहाँ बन्जसिंह से घुड़सवारी, मतीदास से फारसी और गुरुबख्श से गुरुमुखी सीखी। दिल्ली में औरंगजेब के अत्याचारों से दुखी हो कश्मीर के ब्रह्मवृंद १६७५ में गुरु तेगबहादुर के पास आये तब अपने पिता को विचारमग्न बैटे होने का कारण जान नौ वर्ष के गोविन्द राय ने कहा, “आपसे बढ़कर और कीन गौरवशाली धर्मात्मा पुरुष हो सकता है।' गुरु ने कहा, ब्राह्मणों, जाकर कह दो, यदि गुरु तेगबहादुर मतान्तरण कर ले तो हम सब तैयार हैं११ नवम्बर १६७५ को औरंगजेब ने गुरु को पकड़ इस्लाम न स्वीकारने के कारण चाँदनी चौक दिल्ली में मरवा डाला। गुरुजी ने पूर्व में ही ८ जुलाई १६७५ गोविन्दराय को नौ वर्ष की आयु में गुरु गद्दी पर आसीन कर दिया था। सन् १६८६ में पहले युद्ध में पहाड़ी राजा कलिहूर को सैय्यद बुद्धशाह के सहयोग से परास्त कियाइसके बाद लोटगढ़, आनंदगढ़, केशगढ़ और फतेहगढ़ दुर्गों का निर्माण करवाया। पराजितों से संधि कर औरंगजेब को कर दिलाना बंद कर दिया। दिल्ली के निर्देश पर लाहौर से सूबेदार दिलावर खान की आक्रमण के लिए आयी सेना को भी भगाकर लुटेरे हुसैन ख़ाँ को पराजित कर दिया। औरंगजेब जो उस समय दक्षिण में था, ने अपने पुत्र मुअज्जम को भेजा तो पहाड़ी राजाओं को तो परास्त कर दिया पर आनन्दपुर का बाल बाँका न कर सका। सन् १६६६ को वैशाखी के दिन बुलायी गयी अनुयायियों की भरी सभा में गुरुजी सिक्खों के सन्मुख नंगी तलवार लेकर बोले “है कोई ऐसा जो धर्म के लिए अपने प्राण दें।' सन्नाटा छा गया, गुरुजी को क्या हो गया ? सब एक दूसरे की ओर डरे, सहमें हुए से देख रहे थे। तभी लाहौर का दयाराम खत्री उठा, "मैं प्रस्तुत हूँ।" शामियाने में ले गये, खच्च की आवाज आयी, रक्त लगी नंगी तलवार ले वही आवाज फिर लगायी। और इसी क्रम में धर्मदास जाट दिल्ली, मोहकमचन्द्र द्वारका, हिम्मतराय रसोइया जगन्नाथपुरी और पाँचवा साहिबचन्द नाई बीदर सामने आया। थोड़ी देर में गुरु इन पाँचों को लेकर सभा के सामने आये, पंज प्यारे कहकर “खालसा पंथ" की स्थापना की। खालसा को गुरु व गुरु को खालसा का स्थान दिया। केश, कड़ा, कंघा, कच्छा और कपाण रखने के निर्देश दिये। ऊँच-नीच, जाति-पाति को समाप्त कर अपने नाम के साथ सिंह शब्द लिखने को कहा। स्वयं गुरुगोविन्दराय से गुरु गोविन्दसिंह बनेअमृत छकाया और स्वयं छका, जय घोष दिया - “वाहि गुरुजी का खालसा, वाहि गुरुजी की फतेह ।” खालसाईश्वर का है और ईश्वर की विजय सुनिश्चित है। पहाड़ी राजा अभी भी शान्त नहीं बैठे थे। सभी ने एकत्रित हो बीस हजार की सेना ले आक्रमण कर दिया जिसका उत्तर केवल आट हजार की सेना द्वारा दिया गया जिन्हें परास्त कर रोपड़ तक भगायाचिंतित औरंगजेब ने २२ पहाड़ी राजाओं को साथ ले सरहिन्द, लाहौर और जम्मू के सूबेदारों के साथ आनंदपर साहिब पर आक्रमण कर दिया। प्रथम में तो मुगल सेना को परास्त होना पड़ा पर किले का घेरा कड़ा कर देने से बाहर का सम्बन्ध टूट गयासंकट जान २१ दिसम्बर सन १७०४ को पत्नी, चारों बच्चों, सैनिकों को ले किला छोड़कर निकल गये। पता लगने पर युद्ध हुआ जिसमें १६ वर्षीय अजीतसिंह और १४ वर्षीय जुझारसिंह युद्ध में शहीद हो गये४० सिक्खों को ले गुरुजी चमकौर की गढ़ी में पहुँच गये। पर परिवार के शेष लोग, दोनों छोटे बालक व माँ गुजरी भटक कर पुराने रसोइया गंगाराम के गाँव पहुंचे जहाँ उसने विश्वासघात कर सरहिंद के सूबेदार वजीर खान को सौंप दिया। वजीर खान ने जीवित ही जोरावरसिंह व फतेहसिंह को दीवार में चुनवा दिया पर मुस्लिम धर्म स्वीकार नहीं किया। यह दुःखद समाचार सुन माता गुजरी ने प्राण त्याग दिये। गुरु की दोनों पत्नियाँ सुन्दरी व साहिबादेवी भाई मणिसिंह के साथ दिल्ली पहुँच गयी। गुरुजी ने चमकौर से तीन साथियों के साथ निकलकर पुनः सेना एकत्रित की तभी खिंडराना (मुक्तसर) में वजीरखाँ की सेना से मुठभेड़ हो गयी। चालीस सिक्खों के पराक्रम से गुरू ने वजीर खान को पराजित कर तलवंडी साबू (दमदमा) पहुँच गये। यहाँ पर रहते गुरू ने 'गुरु ग्रंथ साहिब' को पुनः सम्पादित कियाआगे यह स्थान सिक्खों की “काशी" के रूप में परिचित हो गया। दक्षिण को जाते समय गुरुजी की उज्जैन के संत नारायणदास के बताये अनुसार 'नावेर' के बैरागी माधोदास से भेंट नांदेड़ में हुई। गुरु गद्दी पर जा बैठेमाधोदास ने वहाँ से हटाने के लिए मन्त्रों का प्रयोग किया पर सफलता न मिलने से उनकी शक्ति को समझ, उनके द्वारा पूरे देश की स्थिति को सुन, वह गुरुजी का बंदा (गुलाम) हा गया। अब वह बंदा बैरागी कहलाने लगा। गुरुजी ने अपने छूटे हुए कार्य को करने के लिए उत्तराधिकारी के नाते पंजाब भेज दिया। वीरों को प्रेरित करते हुए कहते “सवा लाख से एक लड़ाऊँ, चिड़ियों से मैं बाज तुड़ाऊँ, गायों से मैं सिंह लड़ाऊँ, तो गुरु गोविन्दसिंह नाम कहाऊँ।।" खालसा पंथ की सफलता के लिए भगवती की प्रार्थना - “सकल जगत में खालसा पंथ गाजै' - जगे धर्म हिन्दू सकल भण्ड भाजै," करने वाले वीर शिरोमणि गुरु गोविन्दासह जब नांदेड़ (महाराष्ट्र) में विश्राम कर रहे थे तभी एक पठान ने आक्रमण कर दिया। यद्याप गुरुजी ने अपनी तलवार से उसे मार डाला व अन्य दो साथियों को भी बाहर खड़े लागा न मार डालातीन चार दिन के बाद ७ अक्टूबर १७०७ में 'वाहि गुरुजी की फतेह' बोलकर अपने प्राण छोड़ दिये