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डॉ० भीमराव आम्बेडकर
December 6, 2019 • जनस्वामी दर्पण • कहानी ,कविता ,महापुरुषों की जीवनियां

डॉ० भीमराव आम्बेडकर                                                                   डॉ़भीमराव आम्बेडकर डॉ० भीमराव आम्बेडकर के पिता श्रीराम सकवाल कोंकण प्रांत के आम्बावाड़े गाँव .के निवासी थे। परिवार मूलतः नाग वंश से सम्बन्धित था जो कालान्तर में महार जाति के नाम से  जाना जाने लगा। इनके पिता मध्यप्रदेश के 'महू' के सैनिक विद्यालय में हेडमास्टरथे|पिताजी संत कबीर के बड़े भक्त थे। उनके वहाँ १ अप्रैल १८६१ को इनका जन्म हुआ। .पांच र्वष  की अल्पायु में ही इनकी माताजी का स्वर्गवास हो गया था। भीमराव की प्राथमिक ना महाराष्ट्र के डापोली कस्बे व बाद में सतारा में हुई। समाज में उस समय छुआछूत से सम्बन्धित जो बुराई फैली हुई थी, पढ़ाई से लेकर प्रत्येक स्थान पर भीमराव को दंश के रूप में खेलनी पड़ी। सारे मनुष्य तो एक जैसे ही हाड़, मांस और पंच तत्त्वों से बने हैं फिर छोटा-बड़ा, छुआछूत क्यों ? ऐसे अनेक प्रकार के प्रश्न मन में उठने लगे जिनका कोई तार्किक उत्तर न बता पाया। सतारा के विद्यालय में इनका सम्बन्ध ब्राह्मण शिक्षक आम्बेडकर से आया जिससे प्रभावित होकर इन्होंने अपना उपनाम आम्बावाडेकर से बदलकर आम्बेडकर कर लिया। इनकी माता के निधन के बाद पिताजी ने दूसरा विवाह कर लिया। सौतेली माँ के दुर्व्यवहार के कारण इनका पालन फूफी ने किया था। कुछ दिन बाद भीमराव अपने पिता के साथ मुम्बई की पटेल नामक चाल में तंग कोठरी में रहकर -एलफिन्स्टन' विद्यालय में पढ़ने लगे। महानगर में भी अछूतता के अभिशाप से उन्हें मुक्ति न मिल सकी। १६०७ में मैट्रिक प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की जो किसी अछूत समाज के बालक के लिए आश्चर्यजनक बात थी। संस्कृत चाहकर भी इसलिए नहीं पढ़ पाये क्योंकि वे अछूत समाज के थे। १७ वर्ष की आयु में ही रमाबाई से भायखला (मुम्बई) में विवाह हो गया। एलफिन्स्टन विद्यालय से इन्टरमीडियेट कर बी.ए. की परीक्षा १६१२ में उत्तीर्ण की। १६१३ में बड़ौदा महाराजा गायकवाड़ के यहाँ नौकरी करने लगे तभी पिताजी की मृत्यु हो गयी। प्रतिभा, लगन व चरित्र से प्रभावित होकर बड़ौदा महाराजा ने आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका भेज दिया जहाँ कोलम्बिया विश्वविद्यालय स १६१५ में एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। इनकी विद्वतापूर्ण थीसिस के कारण कोलम्बिया विश्वविद्यालय ने इन्हें पी.एच.डी. की उपाधि दी। अब भीमराव डॉ. भीमराव आम्बेडकर कहलाने लगे। अमेरिका में लाला लाजपतराय से भेंट हुई। २१ अगस्त १९१७ को भारत वापस जा गय। बड़ौदा में बड़े पद पर नियुक्ति हो गयी पर कार्यालय में न कोई फाईल हाथ में देता न कोई पानी पिलाता। बैरिस्टरी (डी.एम.सी.) की डिग्री प्राप्त करने १६२० में लंदन गये। पुस्तकालय से पुस्तकें पढ़ बैरिस्टर की परीक्षा पास कर १६२२ में भारत में आ मुम्बई के सिडनहम् महाविद्यालय में प्राध्यापक के पद पर नियुक्ति मिल गयी। १६२३ में मुम्बई में ही बैरिस्ट्री की प्रेक्टिस शुरू की तो १६२४ में बहिष्कृत हितकारिणी की स्थापना कर १६२७ में मुम्बई में लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य के रूप में मनोनीत हुए। समान अधिकारों को लड़ने के उद्देश्य से 'मूक' नामक पत्रिका भी प्रारम्भ की। कोलाया जिले की महाढ़ नगर पालिका चावदार तालाब में आम्बेडकर ने पानी का स्पर्श किया, अनुयायियों ने पानी पिया। लेकिन थोड़ी ही देर में इस सूचना पर कि वह 'वीरेश्वर' मंदिर में भी प्रवेश करंग कुछ लोगों ने हमला बोल उन्हें घायल कर दिया। डॉ. आम्बेडकर ने मामला न्यायालय में लगाया जहाँ उनकी जीत हुई। १६३१ में दूसरी गोलमेज कांफ्रेंस में गांधीजी के साथ अछूतों के लिए अलग निर्वाचन मण्डल की माँग कर अधिकार प्राप्त कर लिया। हरिजन शेष हिन्दू समाज से अलग हो जायेंगे इस चिंता से इस निर्णय के विरुद्ध गांधीजी ने अनशन शुरू कर दिया। अनशन से चिंतित सभी नेताओं का आम्बेडकरजी से एक समझौता पूना में हुआ जिसमें विधान मण्डलों में दस प्रतिशत स्थान सुरक्षित करने का निर्णय होने पर पृथक निर्वाचन का दावा छोड़ दिया। जो 'पूना पैक्ट' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। १६३६ में उन्होंने 'इंडीपेन्डेन्ट' लेबर पार्टी नामक संस्था बनायी। नासिक के प्रसिद्ध कालाराम मंदिर में दर्शन की घोषणा कर अनुयायियों के साथ प्रवेश करना चाहा तो अपमानित कर बाहर निकाल दिया गया। कुपित हो उन्होंने घोषणा की “हिन्द, इस नाते मेरा जन्म हुआ है पर हिन्दू इस नाते मैं मरूँगा नहीं।" ये घोषणा सुन मुल्ला-मौलवी, ईसाई पादरी और मिशनरी के लोगों ने अपने धर्म में लाने की पुरजोर कोशिश की। १५ अगस्त १६४७ को भारत स्वतन्त्र हो गया। २६ अगस्त १६४७ में संविधान बनाने के लिए सात लोगों की समिति बनायी गयी। डॉ. आम्बेडकरजी को इसका अध्यक्ष बनाया गया। ४ नवम्बर १६४८ को संविधान सभा के सम्मुख संविधान का प्रारूप पेश किया गया जिसे २६ नवम्बर १९४८ को स्वीकार कर लिया गया। जब इनकी पत्नी रमाबाई का निधन हो गया तब इन्होंने नर्सिंग होम में कार्य करने वाली डॉ. शारदा कबीर से दूसरा विवाह कर लिया। वह नेहरू मन्त्रिमण्डल में प्रथम कानून मंत्री बने। १६५० में बौद्ध सम्मेलन में भाग लेने श्रीलंका भी गये। बौद्ध के बुद्धत्व व समता से वह अत्यन्त प्रभावित हुए थे। आर्य बाहर से आये हैं इसका उन्होंने मुखर विरोध किया। १४ अक्टूबर १६५६ में पत्नी और अनुयायियों सहित नागपुर में बौद्ध मत की दीक्षा ली। पर्यावरण के प्रति कितना प्रेम था कि कुछ समय जब उन्होंने औरंगाबाद में बिताया तो उस परिसर में कोई पेड़ नहीं था, तो मिलने वालों को नियम बनाया कि जो भी मिलना चाहते हैं वह पहले एक पौथा परिसर में लगायें। अपने समाज बंधुओं को अधिकार दिलवाकर समाज में समता व समरसता का वातावरण बनाने के लिए संघर्ष करने वाले डॉ. भीमराव आम्बेडकर ने ६ दिसम्बर १६५६ को दिल्ली में निज निवास पर अपना शरीर छोड़ दिया। पाँच लाख लोगों ने एकत्रित हो अपने देश के नेता को अश्रुपूरित नेत्रों से अंतिम विदाई दी।