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भगवान् श्रीराम
April 1, 2020 • लेखक धीरसिंह जी पवैया • धार्मिक

भगवान् श्रीराम

भगवान् श्रीराम वर्तमान वैवस्वत मन्वन्तर के त्रेतायुग में कोसलाधिपति राजा दशरथ और महारानी कौसल्या के यहाँ चैत्र शुक्ल नवमी तिथि के अभिजित मुहूर्त में रामजी का जन्म उस समय हआ, जब सूर्य, मंगल, शनि, गुरु और शुक्र पाँचों ग्रह अपने-अपने उच्च स्थान पर थे। लग्न में चन्द्रमा के साथ बृहस्पति विराजमान् थेतदन्तर कैकयी रानी ने भरत और समित्रा रानी ने लक्ष्मण और शत्रुघ्न को जन्म दिया। इन सभी के नाम ग्यारह दिन बाद कुलगुरु वसिष्ठ ने रखते हुए “जो आनंद सिंधु सुख रासी। सीकर तें त्रैलोक सुपासी।।' सो सुखधाम राम अस नामा। अखिल लोक दायक विश्रामा।।" कहा। इन सभी पुत्रों की उत्पत्ति शृंग ऋषि द्वारा यज्ञ के चरु से हुई थी। इनके प्रपितामह इक्ष्वाकु ने चक्रवर्ती साम्राज्य की स्थापना की थीइसलिए उनको इक्ष्वाकु वंशीय कहा जाता है। थोड़े दिनों में विद्याध्ययन कर लिया। “गुरु गृह पढ़न गये रघुराईअल्प काल विद्या सब आयी। प्रातःकाल उठकर प्रतिदिन माता-पिता को प्रणाम करते “प्रातकाल उठि के रघुनाथामातु पिता गुरु नावहिं माथा।। श्रीराम बचपन से ही वीर, धीर, शील सम्पन्न व गंभीर स्वभाव के थे। लोक कल्याण के लिए महर्षि विश्वामित्र के साथ जाकर पूतना और सुबाहु का वध कर मारीच राक्षस को समुद्र में बिना फर के बाण से फेंक दिया था। महर्षि से सम्पूर्ण दिव्यास्त्रों की शिक्षा प्राप्त कर राजा जनक के यज्ञ में राजाओं के मान को मर्दन करने वाले प्राचीन शिव धनुष को तोड़कर सीताजी से विवाह किया। राज्यारोहण के समय कैकेयी द्वारा वनवास देने से बिना विलम्ब किये वन को चल दिये। मानों राज्य और वनवास जो सामान्य जन के लिए एकदम विरोधी और दखी करने वाले हैं, राम का दाना समान ही थे। जिस कार्य के लिए धरती पर जन्म लिया था. वह प्रारम्भ कर दिया। वन निषादराज, जिसकी समाज छाँह भी नहीं छूता था उसे सखा (मित्र) बनाकर उसका और स्वीकार किया। केवट की भक्ति की जिद से अपने पैर धलवाकर गंगा पार गये तो पारिश्रामक हपूर्वक उसने लेने से मना कर दियावन में के रूप मे सीताजी की अंगूठी उसे दी जिसे स्नेहपूर्वक उसने लेने से मना कर दि निवासरत ऋषि-मुनि भारद्वाज, वाल्मीकि आदि के आश्रमों में मिलते हए चित्रकूट पर १९ वनवासी समाज की दशा को जाना। वहाँ से सीता और लक्ष्मण के साथ शरत आश्रम से ऋषियों-मुनियों के साथ आगे बढ़े तब अस्थियों के ढेर को देखकर राम लक्ष्मण के साथ शरभंग ऋषि के आस्थयों के ढेर को देखकर रामजी के पूछनेपर संतों ने बताया कि राक्षसों द्वारा मुनियों को खाने से बची हड्डियों के ढेर हैं।

अपनी आँखों करुणा के आँसू भर श्रीरामजी ने अपनी दोनों भुजा उठाकर प्रतिज्ञा की, 'निशिचर हीन करउँ महि, भुज उठाइ प्रन कीन्ह । सकल मुनिन्ह के आश्रमहि, जाइ-जाइ सुख दीन्ह ।। पृथ्वी को निशाचरों से रहित कर दूंगा। जब रावण ने छद्म रूप धारण कर सीता का हरण कर लिया तब उनकी खोज करते समय वे समाज जिसे त्याज्य, अधम आदि कहता था, उन महर्षि मतंग की शिष्या शबरी (भीलनी) के आश्रम पर लक्ष्मण सहित पधारे। उसके आतिथ्य रूप में भक्ति से युक्त झूठे बेर खाये। नवधा भक्ति की शिक्षा दी। रावण से युद्ध में घायल पक्षिराज जटाय को सांत्वना दे पिता की तरह उसकी अंतिम क्रिया भी की। दण्डकारण्य में रावण की बहिन शूर्पणखा की लक्ष्मण द्वारा नाक कटवा कर चुनौती दे खरदूषण-त्रिशिरा आदि चौदह हजार राक्षसों का अकेले ही वध कर दिया। हनुमान, सुग्रीव आदि से मैत्रीकर वनवासी समाज को संगठित-एकत्रित कर, उन वानर भालू कहे जाने वाले वीरों की सहायता से एक सौ योजन समुद्र के पार सीता की खोज हनुमानजी द्वारा करने पर नल आदि तकनीकी वीरों द्वारा सौ योजन लम्बा समुद्र का सेतु (पुल) भी बाँधाजिसका अस्तित्व आज भी अवशेष के रूप में है। देवताओं के लिए घातक दुर्धर्ष वीर रावण को जिसके एक लाख पुत्र और सवा लाख नाती थे, भीमकाय वीरों के साथ श्रीराम ने सेना के सहयोग से मार गिरायावहाँ का राज्य रावण के लघु माता विभीषण को दिया। श्रीराम लघुभ्राता लक्ष्मण से कहते हैं ‘अपि स्वर्णमयी लंका न में लक्ष्मण रोचतेजननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।। तात यह सोने की लंका मुझे अच्छी नहीं लग रही है। जन्म देने वाली जननी और जन्मभूमि से प्यारा मुझे कुछ भी नहीं हैअयोध्या में आने पर श्रीराम ने पुष्पक विमान जो रावण ने कुबेर से छीना था उसे उसी की सेवा में भेज दिया। राज्यारोहण के समय गुरु वसिष्ठ से कहते हैं कि 'ये सब सखा सुनहुँ सब मेरे भयउ समर सागर कहुँ बेरे।। ये सब सखा संग्राम रूपी समुद्र में मेरे लिए जहाज (बेड़े) के समान हुए। मेरे लिए इन्होंने अपने जन्म तक हार दियेये मुझे भाई भरत से भी अधिक प्रिय हैं। श्रीरामजी सीता की सुध देने पर हनुमानजी से कहते हैं, "हनुमान्! मैं तुम्हारे ऋण से उऋण नहीं हो सकता। तन तो क्या मन भी तुम्हारे सामने जाने से कतराता है।" उपकार की कैसी अद्भुत स्वीकारोक्ति। एक समय श्रीरामजी ने एक सामान्य नागरिक धोबी के लांछन के कारण प्रिय पत्नी सीता को त्याग दिया। वचन भंग करने पर स्वयं लक्ष्मण को भी त्यागा। भाई का भाई के साथ, माता-पिता के साथ, कैसा व्यवहार हो यह मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने अपने जीवन से बताते हुए ग्यारह हजार वर्षों तक राज कियाअन्त में अपने पुत्र कुश और लव को राज्य दे अयोध्या की संपूर्ण प्रजा के साथ परमधाम को सिधार गये