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. राजा हरिश्चन्द्र
January 6, 2020 • जनस्वामी दर्पण • कहानी ,कविता ,महापुरुषों की जीवनियां

राजा हरिश्चन्द्र                                                                       सूर्यवंश में उत्पन्न हरिश्चन्द्र अयोध्या नरेश राजा त्रिशंकु के पुत्र थे। ये राजा त्रिशंकु वही व्यक्ति थे, जिन्हें विश्वामित्र ने सदेह स्वर्ग भेजने का प्रयत्न किया था किन्तु देवताओं के राजा इन्द्र द्वारा अवरोध किए जाने के कारण उन्हें अंतरिक्ष में ही लटके रहना पड़ा था।                                                      महाराजा हरिश्चन्द्र प्रसिद्ध दानी, भगवद भक्त तथा धर्मात्मा थे। अपनी दानशीलता एवं सत्यनिष्ठा के कारण उन्होंने अत्यंत ख्याति प्राप्त की। देवराज इन्द्र की प्रेरणा से महर्षि विश्वामित्र ने उनकी सत्यनिष्ठा की परीक्षा ली।                                                                                                    एक बार महर्षि विश्वामित्र ने राजा से स्वप्न में उनका सारा राज दान में माँग लिया। दान पाते ही महर्षि ने उनसे दान की सांगता के लिए दक्षिणा की माँग की। सांगता दान के रूप में विश्वामित्र ने ढाई भार सोना उनसे माँगा। राजा ने स्वप्न में ही उन्हें यह दक्षिणा भी चुकाने के लिए वचन दे दिया।                                                                                          प्रात: काल होते ही महर्षि विश्वामित्र दान की दक्षिणा लेने राज दरबार में पहुँच गए। स्वप्न में दिए गए वचन को पूरा करने के लिए राजा हरिश्चन्द्र तुरंत तैयार हो गए। अपने मंत्रियों एवं सलाहकारों के बार-बार समझाने के उपरान्त भी राजा ने अपनी सत्यवादिता से हटने के लिए साफ इंकार कर दिया।                                                                                                                                अपनी सत्यनिष्ठा एवं वचन बद्धता के कारण राजा हरिश्चन्द्र को पुत्र रोहिताश्व और पत्नी शैव्या के साथ अयोध्या का राज त्यागकर काशी आना पड़ा। महर्षि विश्वामित्र को दक्षिणा देने के लिए उन्होंने अपनी पत्नी शैव्या को, पुत्र रोहिताश्व के साथ, एक ब्राह्मण के हाथ बेच दिया। परन्तु पत्नी और पुत्र को बेचने के बाद भी जो धन उन्हें मिला वह इतना कम था कि उसमें महर्षि विश्वामित्र की दक्षिणा नहीं चुकाई जा सकती थी।                                                                                                  फलतः वे एक दिन काशी के उस चौराहे पर जाकर खड़े हो गए, जहाँ दास दासियों का क्रय-विक्रय हुआ करता था। दासों के इस बाजार में श्मशान के स्वामी डोम राजा ने उन्हें खरीद लिया और श्मशान की चौकीदारी करने तथा शवदाह के लिए कर वसूल करने का दायित्व दिया।                                                                                                    रानी शैव्या, जो कभी अयोध्या की महारानी थीं, अब एक निष्ठुर ब्राह्मण के यहाँ दासी का काम करने लगी। पुत्र रोहिताश्व को फूल चुनने का काम मिला। फूल चुनते-चुनते एक दिन रोहिताश्व की सर्पदंश से मृत्यु हो गई।                                                                                                    बेचारी महारानी शैव्या अब तो दासी मात्र थी। पुत्र के शव को उटाए अकेले शमशान पहुँची। पर हाय रे दुर्भाग्य। श्मशान का चौकीदार बिना कर लिए शव को जलाने नहीं दे सकता था। कौन चौकीदार? उस मृत पुत्र का पिता-स्वयं महाराज हरिश्चन्द्र। छाती पर पत्थर रखकर कर्तव्य का पालन करना था। चाण्डाल स्वामी की आज्ञा जो थी कि कर दिए बिना कोई शव जा न पावे। राजा हरिश्चन्द्र का हृदय अपने इकलौते पुत्र के शव को देखकर अन्दर ही अन्दर रो उठा परन्तु उन्होंने कहा-“भद्र, जिस धर्म के लिए मैंने राज्य छोड़ा, तुम्हें छोड़ा, रोहित को छोड़ा, तुम दासी बनीं, मैं चाण्डाल का सेवक बना, उस धर्म को मैं नहीं छोडूंगा। तुम मुझे धर्म पर डटे रहने में सहायता करो।"                                                                                                                                                                महारानी शैव्या के पास देने के लिए देह पर पहनी हुई साड़ी के सिवाय और कुछ न था। अन्तत: उन्होंने तय किया कि वह साड़ी को ही आधा फाड़कर कर के रूप में चुकायेंगी। पर जैसे ही महारानी ने साड़ी उतारकर उसे आधा फाड़ने के लिए उद्यत हुई कि आकाश दिव्य प्रकाश से आलोकित हो गया और गुरु गंभीर वाणी में आकाशवाणी हुई                                            अहो दानमहो धैर्यमहो वीर्यमखण्डितय। उदार धीर वीराणां हरिश्चन्द्रोनिदर्शनम।।                                                            हे राजा हरिश्चन्द्र, आप धन्य हैं, आपका दान धन्य है, आपकी धीरता और वीरता धन्य है। आप उदार धीर और वीर पुरुषों के आदर्श हैं। आकाशवाणी होने के साथ, देवराज इन्द्र, धर्मराज एवं ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों देवता प्रकट हो गए। देवराज इन्द्र ने उनसे क्षमा माँगते हुए कहा कि उन्होंने ही विश्वामित्र के माध्यम से उनकी सत्यनिष्ठा की परीक्षा लेनी चाही थी। इसमें वे सफलता पूर्वक उत्तीर्ण हुए।                                                                                                                      देवताओं की कृपा से रोहिताश्व जीवित हो गया। राजा हरिश्चन्द्र और शैव्या ने दिव्य देह धारण किया। उन्होंने कहा - "मैं अपना समस्त पुण्य अपनी प्रजा को देना चाहता हूँ, मैं अकेला स्वर्ग जाना नहीं चाहता। मेरी प्रजा के लोग स्वर्ग में रहें। मैं उनके पाप भोगने के लिए नरक चला जाऊँगा। उनकी प्रजावत्सला देखकर देवता संतुष्ट हो गए। फिर उनके इच्छानुसार समस्त अयोध्या नगरी के लोग भी विमानों पर सवार होकर स्वर्ग गए। महर्षि विश्वामित्र ने तब स्वयं रोहिताश्व को अयोध्या के सिंहासन पर अभिषिक्त किया।                                                                                                                                                    दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र के लिए तब कहाहरिश्चन्द्र समो राजा न भूतो न भविष्यति। हरिश्चन्द्र के समान राजा न कोई हुआ न होगा। अपनी सत्यनिष्ठा के कारण राजा हरिश्चन्द्र भारतीय संस्कृति के आदर्श के रूप में विश्व में प्रख्यात हैं।