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शूरवीर तानाजी मालुसरे का गौरवपूर्ण इतिहास
February 4, 2020 • जनस्वामी दर्पण • कहानी ,कविता ,महापुरुषों की जीवनियां

शूरवीर तानाजी मालुसरे का गौरवपूर्ण इतिहास |                                    ० नाम - तानाजी मालुसरे                              ० जन्म - 1600 AD                                         ० जन्म स्थान - गोदोली गाँव, महाराष्ट्र, भारत   ० पिता का नाम - सरदार कलोजी                     ० माता का नाम - पार्वतीबाई                           ० पत्नी का नाम - ज्ञात नहीं                             ० प्रसिद्धि - सिंहगढ़ की लड़ाई                             ० मृत्यु - 1670 AD                                          तानाजी मालुसरे एक वीर मराठा सरदार थे | उनका जन्म 17वीं शताब्दी में हुआ था एतिहासिक तथ्यों अनुसार वह महाराष्ट्र राज्य के कोंकण प्रान्त में महाड के पास "उमरथे" से आये थे (जन्म स्थान - गोदोली गाँव, महाराष्ट्र, भारत)                                                                                                                   इस महान योद्धा को सिंहगढ़ की लड़ाई में प्रचंड पराक्रम और अतुल्य साहस के लिए याद किया जाता है उनकी भडिग निष्ठा और कर्तव्यपरायणता प्रशंसापात्र है तानाजी और छत्रपति शिवाजी महाराज एक दुसरे के घनिष्ठ मित्र थे यह दोनों बालपन सखा भी रहे हैं             बचपन से ही तानाजी को तलवारबाजी का बड़ा शौक था बड़े हो कर तानाजी मराठा सेना के किल्लेदार (सुभेदार) बने मराठा साम्राज्य सुरक्षा और समृद्धि हेतु कोंढाणा किले पर जीत हासिल करना बेहद ज़रूरी था इसी लक्ष्य को सिद्ध करने के लिए शिवाजी महाराज ने तानाजी के नेतृत्व में कोंढाणा दुर्ग अर्जित करने का निश्चय किया इस भीषण संग्राम में मराठा सेना विजय तो हुई लेकिन तानाजी मालसुरे वीरगति को प्राप्त हुए आइये इस महान योद्धा के पराक्रम और वीरता से जुड़ी रोचक बातें जानें                                                             सिंहगढ़ की लड़ाई (सन 1670)                                   बात उस समय की है जब तानाजी के पुत्र रायबा के विवाह की तैयारी जोरशोर से चल रही थी इसी शुभ कार्य हेतु वह शिवाजी महाराज को आमत्रित करने भी जाने वाले थेतभी उन्हें पता चला कि शिवाजी कोंढाणा पर चढ़ाई करने वाले हैं इस योजना हेतु उन्हें शिवाजी महाराज की और से बुलावा भी आ गया उन्होंने तुरंत महाराज के पास जा कर इस साहसी कार्य को खुद करने की पेशकश की                                         अपने पुत्र के विवाह जैसे महत्वपूर्ण प्रसंग को प्राथमिकता न देते हुए उन्होंने अपने कर्तव्य को चुना इस बात से सुभेदार तानाजी की राजभक्ति और शिवाजी महाराज के प्रति गहन मित्रता का मर्म पता चलता है।                        सिंह गढ़ किले पर तानाजी का आगमन              छत्रपति शिवाजी महाराज की आज्ञा एवं इच्छा अनुसार सुभेदार तानाजी 342 बेहतरीन मराठा सिपाहियों की टकड़ी के साथ कोंढाणा (सिंह गढ़) किले पर पहंचे इस गढ़ को जीतना किसी भी तरह से सहज नहीं था उन्होंने रात के घुप अँधेरे में किले के पश्चिम भाग से अंदर घुसने की योजना बनाई सिंह गढ़ किले की पश्चिमी दिशा में खड़ी चट्टान स्थित होने के कारण मुग़ल सोच भी नहीं सकते थे कि वहा से आक्रमण संभव है इसीलिए वहां पर नाम मात्र के सुरक्षा इंतज़ाम थे               युद्ध में घोरपड़ (मॉनिटर लिज़र्ड) की भूमिका      तानाजी ने किले की उस दिशा से अदर प्रवेश करने के लिए कुल तीन प्रयास किए जिनमें से दो विफल रहे उसके बाद तीसरे प्रयास में उन्हें सफलता मिल गयी उन्होंने “घोरपड़" की मदद से खड़ी चट्टान की चढ़ाई की घोरपड़ एक प्रकार की छिद्रित मोनिटर छिपकली ( monitor lizard )होती है रस्सी की सहाय से उसे दीवार पर चिपका कर खड़ी चढ़ाई संभव होती है उस छिपकली का नाम “यशवंती" रखा गया था तानाजी ने इसी युक्ति के बल पर किले में प्रवेश किया हालांकि सभी इतिहासकार इस बात को लेकर एकमत नहीं हैं।                 तानाजी का दिलेर युद्ध कौशल                          युद्ध में तानाजी की ढाल टूट गई तब उन्होंने अपना सिर का फेटा (पगड़ी को) खोल लिया और उसे अपने दूसरे हाथ में लपेट लिया ताकि उसे ढाल की तरह इस्तमाल कर सकें उसके बाद उन्होंने एक हाथ से तीव्र गति से तलवार चलाई और दूसरे हाथ पर शत्रु की तलवार के घाव लिए                                 किल्लेदार उदयभान राठौड़                                     उदयभान धर्म से हिन्दू था लेकिन निजी लाभ और स्वार्थ के लिए मुघलों से जा मिला था और सत्ता पाने के लालच में धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम बन गया था। उस समय कोंढाणा किला उदयभान के नियंत्रण में था उसको मुगल जनरल जय सिंह प्रथम द्वारा इस पद पर नियुक्त किया गया था                 कोंढाणा युद्ध का संक्षिप्त वृतांत                          मराठा सेना के किले में घुसते ही मुगल सेना में अफरातफरी का माहौल छा गया देखते ही देखते अँधेरी रात में सिंह गढ़ किला युद्ध का मैदान बन गया तानाजी के वीर लडाके 5000 मुघलों की सेना पर काल बन कर टूट पड़े कोढ़ाणा युद्ध में तानाजी मालुसरे और उदयभान राठौड़ के बीच घोर संग्राम हुआ इस लड़ाई में मुगल सुभेदार उदयभान तानाजी पर धोखे से वार करता है इस लड़ाई में तानाजी गभीर रूप से घायल हो जाते हैं और फिर उनकी मृत्यु हो जाती है तब उनके शेलार मामा उदयान को मौत के घाट उतार कर, तानाजी की मौत का बदला लेते हैं ।                                                  सूर्याजी मालसुरे का आक्रमण                                    सूर्याजी मालसुरे तानाजी के छोटे भाई थे उन्होंने कोंढाणा (सिंह गढ़) की लड़ाई में 500 सैनिकों के साथ कल्याण द्वार से मोरचा संभाला उन्होंने बड़ी वीरता से मुघलों को खदेड़ दिया और किले पर विजय का ध्वज लहराया                         तानाजी की मृत्यु पर शिवाजी महाराज की मनोदशा                                                      बचपन के मित्र और अपनी सेना के बहादुर सुभेदार को खो देने पर शिवाजी शोकमग्न हो गए उन्होंने भावुक हो कर यह वचन कहे...           “गढ़ आला पण सिंह गेला"                                               "गढ़ तो जीत लिया पर मेरा सिंह नहीं रहा"         कोंढाणा (सिंह गढ़) किले का इतिहास             यह एक प्राचीन पहाड़ी किला है पूर्व समय में यह किला कोंढाणा के नाम से जाना जाता था सिंहगढ़ का यह एतिहासिक किला महाराष्ट्र राज्य में पुणे शहर से 30 किलोमीटर दूर दक्षिण पश्चिम में स्थित है इसे करीब 2000 वर्ष पहले निर्मित किया गया था                                                                     सिंह गढ़ किले का एतिहासिक घटना क्रम            ० ईस्वी 1328 में दिल्ली राज्य के सम्राट "महम्मद बिन तुगलक" ने कोली आदिवासी सरदार नाग नायक से किले पर कब्जा कर लिया                                                              ० शिवाजी के पिता सभाजी भोसले इब्राहीम आदिल शाह प्रथम के सेनापति थे उनके हाथ में पुणे का नियंत्रण था स्वराज्य स्थापना हेतु उन्होंने आदिल शाह के सुभेदार सिद्दी अम्बर को परास्त किया और कोंढाणा (अब सिंह गढ़) किला जीत लिया                                                                                      ० इसवी 1647 में छत्रपति शिवाजी ने किले का नाम सिंह गढ़ किया 0 इसवी 1649 में शाहजी महाराज को आदिल शाह की कैद से आज़ाद कराने के लिए सिंह गढ़ किला छोड़ना पड़ा                                                                                           ० इसवी 1670 में शाहजी और शिवाजी महाराज ने मिल कर सिंह गढ़ किला फिर से अर्जित कर लिया 0 संभाजी महाराज की मृत्यु के बाद, एक बार फिर मुगलों में यह किला फ़तेह किया                                                                           ० इसवी 1693 में मराठों ने "सरदार बलकवडे" के कशल नेतृत्व की वजह से सिंह गढ़ किले को जित लिया                                                                                                    ० इसवी 1703 में औरंगजेब ने यह किला जीता करीब तीन वर्ष बाद, संगोला, पतांजी शिवदेव और विसाजी चापरा की कुशल युद्धनिति के कारण मराठों में यह किला जित लिया                                                                                                     ० इसवी 1818 तक इस किले पर मराठा साम्राज्य का आधिपत्य रहा उसके बाद अंग्रेजों ने यह किला जित लिया । उन्हें यह कठिन कार्य अंजाम देने के लिए करी 90 दिन लगे।                                                                                        तानाजी मालुसरे और शिवाजी महराज से जुड़ी प्रचलित कहानी                                              उन दिनों मुगल सेना शिवाजी महाराज की खोज में लगी थी इस लिए शिवाजी वेश बदल कर रहते थे कुछ समय बाद विचरण करते हुए वह एक गरीब ब्राह्मण के घर पहुंचे यह व्यक्ति अपनी माता के साथ रहता था और भिक्षा मांग कर अपना घर चलाता था खुद की आर्थिक स्थिति दयनीय होने के बावजूद उसने यथाशक्ति शिवाजी महाराज का आदर सत्कार किया एक दिन सुबह विनायक (ब्राह्मण) भिक्षा मांगने घर से निकले दुर्भाग्यवश उस दिन उन्हें बहुत कम अन्न प्राप्त हुआ तब घर जा कर उन्होंने भोजन बनाया और अपनी माता और शिवाजी को खिला दिया उस रात वह खुद भूखा ही सो गया                                एक दिन सुबह विनायक (ब्राह्मण) भिक्षा मांगने घर से निकले दुर्भाग्यवश उस दिन उन्हें बहुत कम अन्न प्राप्त हुआ तब घर जा कर उन्होंने भोजन बनाया और अपनी माता और शिवाजी को खिला दिया उस रात वह खुद भूखा ही सो गया                                                              अपने आतीथेय की इस दरियादिली को देख कर शिवाजी भावुक हो गए उन्होंने विनायक की दरिद्रता दूर करने का निश्चय किया इसी प्रयोजन से उन्होंने वहां के एक मुग़ल सरदार को पत्र भिजवाया                                                  पत्र में लिखा था कि शिवाजी महाराज इस दिन ब्राह्मण के घर पर रुके हैं इस महत्वपूर्ण सूचना के बदले इस गरीब ब्राह्मण को 2 हज़ार अशर्फियाँ दे दें पत्र मिलते ही मुग़ल सुभेदार पूरी बात समझ गया चूँकि वह शिवाजी महाराज की इमानदारी और बड़प्पन से भलीभांति परिचित था                                                सूचना मिलते ही उसने गरीब ब्राह्मण को पुरस्कार दे दिया और शिवाजी महाराज को उसके घर से गिरफ्तार कर लिया। इस प्रसंग के बाद तानाजी के माध्यम से विनायक (ब्राह्मण) को यह पता चला की उनके घर स्वयं छत्रपति शिवाजी महराज ठहरे थे                                                        उनके घर आश्रय लेने की वजह से शिवाजी मगल सेना के हाथ लगे, इस काम के कारण ब्राह्मण छाती पीटपीट कर विलाप करने लगा तभी तानाजी ने उसे सांत्वना दी और मार्ग में ही मुगल सुभेदार की टुकड़ी से संघर्ष कर के शिवाजी महाराज को मुक्त करा लिया