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मोहन भागवत जी की जीवनी
September 11, 2019 • जनस्वामी दर्पण

मोहन भागवत जीवनी 

   मोहन भागवत (अंग्रेज़ी: Mohan Bhagwat, जन्म: 11 सितम्बर, 1950, चन्द्रपुर, महाराष्ट्र) एक पशु चिकित्सक और 2009 से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक हैं। उन्हें एक व्यावहारिक नेता के रूप में देखा जाता है। के एस सुदर्शन ने अपनी सेवानिवृत्ति पर उन्हें अपने उत्तराधिकारी के रूप में चुना था।


   पेशे से पशु चिकित्सक और वर्तमान समय में आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत का जन्म 11 सितम्बर, 1950 में महाराष्ट्र के छोटे से शहर चंद्रपुर में हुआ था। मोहन भागवत का वास्तविक नाम मोहनराव मधुकर राव भागवत है। इनका पूरा परिवार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ा हुआ था। मोहन भागवत के पिता मधुकर राव भागवत चंद्रपुर क्षेत्र के अध्यक्ष और गुजरात के प्रांत प्रचारक थे। मधुकर राव ने ही लालकृष्ण आडवाणी का आरएसएस से परिचय करवाया था। मोहन भागवत अपने भाई-बहनों में सबसे बड़े हैं। इनके छोटे भाई चंद्रपुर आरएसएस इकाई के अध्यक्ष भी हैं।

        आपात काल के दौरान भूमिगत कार्य करने के बाद भागवत 1977 में अकोला (महाराष्ट्र) में प्रचारक बन गए और बाद में उन्हें नागपुर और विदर्भ क्षेत्रों का प्रचारक बनाया गया।  वर्ष 1991 में सारे देश में संघ कार्यकर्ताओं के शारीरिक प्रशिक्षण के लिए अखिल भारतीय शारीरिक प्रमुख बने और वे इस पद पर 1999 तक रहे। 

        इसी वर्ष उन्हें सारे देश में पूर्णकालिक   काम करने वाले संघ कार्यकर्ताओं का प्रभारी, अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख, बना दिया गया।  वर्ष 2000 में जब राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैय्या) और एच.वी. शेषाद्रि ने क्रमश: संघ प्रमुख-सरसंघचालक और महासचिव (सरकार्यवाह) पद से त्याग पत्र दिए तो के.एस. सुदर्शन को नया संघ प्रमुख और मोहन भागवत को नया संघ प्रमुख और मोहन भागवत को सरकार्यवाह बनाया गया था।  


        वर्ष 2009 में 21 मार्च को मोहन भागवत को सरसंघचालक का ओहदा दिया गया। संघ का प्रमुख बनने वाले वे युवा नेताओं में से एक हैं।   उन्हें संघ का स्पष्ट भाषी, विनम्र और व्यवहारिक प्रमुख माना जाता है जोकि संघ को राजनीति से दूर रखने की एक स्पष्ट दूरदृष्टि रखते हैं।   
भागवत को औरतों से घृणा करने वाला नेता भी माना जाता है और वे पश्चिमी देशों के घोर विरोधी हैं। हाल ही में एक भाषण में उन्होंने कहा था कि 'महिलाओं से घरों का काम करने की   अपेक्षा की जाती है' और उनका कहना था कि 'बलात्कार की घटनाएं इंडिया (पश्चिमपरस्त भारत) में होती हैं भारत (ग्रामीण और भारत के अबतक नैतिक रूप से श्रेष्ठ हिस्सों) में नहीं।

        अकोला में जिला प्रचारक रहे, फिर संघ की रचना में जिस तरह से प्रांतों का निर्माण किया है उसमें विदर्भ एक अलग प्रांत है. वे विदर्भ के प्रांत प्रचारक रहे. विदर्भ के प्रांत प्रचारक रहते हुए वे नागपुर के संघ मुख्यालय के संपर्क में लगातार बने रहे. विदर्भ के बाद वे बिहार के क्षेत्र प्रचारक रहे. 1987 में संघ की केन्द्रीय कार्यकारिणी में आ गये और अखिल भारतीय सह शारिरीक प्रमुख के बतौर काम करने लगे. केन्द्रीय कार्यकारिणी में उन्होंने 1991 से 1999 तक शारीरिक प्रमुख के रूप में काम किया फिर एक साल के लिए प्रचारक प्रमुख हुए. सन 2000 में जब सुदर्शन सरसंघचालक बने तो मोहनराव भागवत सरकार्यवाह बनाये गये.

        2000 से 2009 तक वे तीन संघ के सरकार्यवाह बने रहे. आरएसएस की कार्यप्रणाली में दूसरे नंबर का कार्याधिकारी होता है. सरकार्यवाह रहते हुए मोहनराव भागवत आमतौर पर चुपचाप ही काम करते रहे और कभी संघ की सीमा के बाहर जाकर न तो मीडिया से बात की और न ही किसी प्रकार का कोई बयान दिया. संघ और उसके अनुसांगिक संगठनों के मंचों पर वे लगातार संघ को मजबूत करने के लिए बोलते और काम करते रहे.
 

        लेकिन 22 मार्च 2009 को नागपुर में जब उन्हें आरएसएस का छठां सरसंघचालक बनाने की घोषणा की गयी तब शायद ही किसी को उम्मीद रही हो कि मोहनराव की संघवाली दृढ़ता भाजपा के साथ भी लागू होगी और सबसे पहले उनके पारिवारिक मित्र और पिता के शिष्य लालकृष्ण आडवाणी पर ही लागू होगी.

        मोहन भागवत को एक व्यावहारिक नेता के रूप में देखा जाता है। उन्होंने हिन्दुत्व के विचार को आधुनिकता के साथ आगे ले जाने की बात कही है। उन्होंने बदलते समय के साथ चलने पर बल दिया है। लेकिन इसके साथ ही संगठन का आधार समृद्ध और प्राचीन भारतीय मूल्यों में दृढ़ बनाए रखा है। वे कहते हैं कि इस प्रचलित धारणा के विपरीत कि संघ पुराने विचारों और मान्यताओं से चिपका रहता है, इसने आधुनिकीकरण को स्वीकार किया है और इसके साथ ही यह देश के लोगों को सही दिशा भी दे रहा है।

        हिन्दू समाज में जातीय असमानताओं के सवाल पर, भागवत ने कहा है कि अस्पृश्यता के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि अनेकता में एकता के सिद्धान्त के आधार पर स्थापित हिन्दू समाज को अपने ही समुदाय के लोगों के विरुद्ध होने वाले भेदभाव के स्वाभाविक दोषों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। केवल यही नहीं अपितु इस समुदाय के लोगों को समाज में प्रचलित इस तरह के भेदभावपूर्ण रवैये को दूर करने का प्रयास भी करना चाहिए तथा इसकी शुरुआत प्रत्येक हिन्दू के घर से होनी चाहिए।

मोहन भागवत का दृष्टिकोण :

        मोहन भागवत एक व्यवहारिक नेता हैं। वह आधुनिकता के साथ हिंदुत्व को अपनाने की पैरवी करते हैं। संघ की मूलभूत विशिष्टताओं को बरकरार रखते हुए मोहन भागवत समय के साथ बदलने में विश्वास रखते हैं। मोहन भागवत हिंदू धर्म और इसकी मान्यताओं का पूरा समर्थन करते हैं। लेकिन वह अस्पृश्यता के बड़े विरोधी हैं। उनका मानना है कि हिंदू धर्म अनेकता में एकता को अपने अंदर समाहित किए हुए है, यहां बिना किसी भेदभाव के सभी अनुयायियों को बराबर स्थान और सम्मान मिलना चाहिए।

विचार :

        मोहन भागवत को एक व्यावहारिक नेता के रूप में देखा जाता है। उन्होंने हिन्दुत्व के विचार को आधुनिकता के साथ आगे ले जाने की बात कही है। उन्होंने बदलते समय के साथ चलने पर बल दिया है। लेकिन इसके साथ ही संगठन का आधार समृद्ध और प्राचीन भारतीय मूल्यों में दृढ़ बनाए रखा है। वे कहते हैं कि इस प्रचलित धारणा के विपरीत कि संघ पुराने विचारों और मान्यताओं से चिपका रहता है, इसने आधुनिकीकरण को स्वीकार किया है और इसके साथ ही यह देश के लोगों को सही दिशा भी दे रहा है।

        हिन्दू समाज में जातीय असमानताओं के सवाल पर, भागवत ने कहा है कि अस्पृश्यता के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि अनेकता में एकता के सिद्धान्त के आधार पर स्थापित हिन्दू समाज को अपने ही समुदाय के लोगों के विरुद्ध होने वाले भेदभाव के स्वाभाविक दोषों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। केवल यही नहीं अपितु इस समुदाय के लोगों को समाज में प्रचलित इस तरह के भेदभावपूर्ण रवैये को दूर करने का प्रयास भी करना चाहिए तथा इसकी शुरुआत प्रत्येक हिन्दू के घर से होनी चाहिए