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गजल
August 30, 2019 • जनस्वामी दर्पण

                   ||  गजल ||

दर्द के आशियानों में दिल को संभाल रखा है ,

शीशे के  प्यार में  सपनों को  संभाल रखा है ||

वे खबर  सांसे नाचती   रही लहरों के  संग .

सूखी नदियों के किनारे को संभाल रखा है ||

साथ होकर भी  चलना पाए थे साथ मेरे .

पकड़   छांव  हमने खुद को संभाल रखा है ||

लिख न   पाये हम   अपनी    ही दासता .

कोरे पन्नों को अब.  तक संभाल  रखा है ||

बिखर गए.  फूल.   भी    महकते- महकते .

तितलियों ने आंसुओं को भी संभाल रखा है ||

एक तरफ आदमी  अजनबी सा लगता है .

दुनिया भर के मुखौटों को संभाल रखा है ||

देह की   बस्ती    में मन.  तडपता ही रहा .

सीने में जलती आग को संभाल रखा है ||

बचना पाया भगवान भी सौदागरों के जाल से .

 पता नहीं किसने किसको  संभाल रखा है ||

               (लेखक राजेंद्र कोचला )